ट्रेडिंग की दुनिया में हर समय मार्केट ट्रेंड में नहीं चलता। कई बार मार्केट एक निश्चित दायरे (Range) में ऊपर-नीचे होता रहता है। ऐसे समय को साइडवे रेन्जिंग मार्केट कहा जाता है।
इस केस स्टडी में हम समझेंगे कि ऐसे मार्केट में स्विंग ट्रेडिंग कैसे की जाती है और कैसे कम जोखिम में बेहतर एंट्री ली जा सकती है।
जनवरी २०१० से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का मासिक चार्ट नीचे दर्शाया है। उसमें भाव रेन्ज बाऊन्ड या साइडवे ट्रेन्ड को दर्शाता है। यह स्टॉक लगभग ८ सालों तक यानी २०१० से २०१८ के बीच १५० से ३५० के बीच अटका हुआ था।
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| स्टेट बैंक ऑफ इंडिया |
यहाँ पर १५० का लेवल मजबूत सपोर्ट के रूप में कार्य करता है और ३५० का लेवल मजबूत रेजिस्टन्स के रूप में कार्य करता है।
इस तरह के रेन्जबाऊन्ड मार्केट में जब शेअर्स का भाव सपोर्ट लेवल के पास आता है तब लाँग पोजिशन ली जा सकती है और जब स्टॉक का भाव रेजिस्टन्स के पास आता है तब शॉर्ट पोजिशन ली जा सकती है।
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| स्टेट बैंक ऑफ इंडिया |
जनवरी २०२० में ट्रेडर शॉर्ट पोजिशन ले सकते थे (चार्ट में सर्कल से दर्शाया है) और उसके बाद मई २०२० में जब शेअर्स का भाव सपोर्ट लेवल पर आता है तब उसमें से एक्झिट हो सकते थे।
वैसे ही ट्रेडर जून २०२० में लाँग पोजिशन ले सकते थे (चार्ट में सर्कल से दर्शाया है) और उसके बाद फरवरी २०२१ में जब शेअर्स का भाव रेजिस्टन्स लेवल के पास आता है तब उसमें से एक्झिट हो सकते थे।
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